राहुल गांधी फ़ीनिक्स चिड़िया हैं.

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*साभार प्राप्त*

फ़ीनिक्स एक अजूबा काल्पनिक पक्षी है.
वो अपनी राख से पुनर्जीवित हो जाता है.
उसके टुकड़े- टुकड़े कर दो फिर इकठ्ठा हो जाता है.
ख़ुद को जोड़-बटोरकर ज़िंदा होने की यह फ़ितरत नायाब है.
राहुल गांधी वाकई फ़ीनिक्स चिड़िया हैं.

“उनका छवि चरित्र हनन,
अरबों रुपयें का भाजपाई प्रोजेक्ट है.”

उनकी आईटी सेल दिनरात एक आदमी से घबराई रहती है.
राहुल ने मुँह खोला नहीं कि “पप्पू-पप्पू” ईको करने लगता है.

सोशल मीडिया में कार्टून पर कार्टून तैरने लगते हैं.
भाजपाई प्रवक्ता उनके नाम पर खें-खें करके खिल्ली उड़ाते हैं.
दरअसल, इन सबको राहुल गांधी से डर लगता है.. बहुत डर लगता है.
डरे हुए लोग हर समय अपने डर का मज़ाक बनाते हैं.

सच के खिलाफ़ झूठ का प्रपंच बहुत दिन नहीं चलता.
लोगों को आभास होने लगा है “ठगवा तो नगरिया लूट गवा.”
कोरोना के बीच राहुल जब बोले तो सरकार बेचैन हो गई.
लोगों को लगा कि यह इंसान तो उनका दर्द जानता है.
राहुल गांधी की इंसानियत का मखौल बनाने वालों की कलई खुल गयी.
अब पाॅपुलर परसेप्शन बदल रहा है.
लोगों को लगता है कि अगर राहुल होते तो कोरोना से लेकर आर्थिक मंदी व हर समस्या निपटते.
वो अब मोदीजी पर सवाल उठाने से नहीं हिचकते.
उनको राहुल अपने हितैषी लगने लगे हैं.
“यह राहुल गांधी वाकई फ़ीनिक्स चिड़िया हैं.”

बहुत बार लिखा है, फिर दोहराता हूँ..राहुल गांधी इस देश की उम्मीद हैं.
एक दिन आयेगा जब लोग अपनी अज्ञानता को कोसते हुए प्रायश्चित की मुद्रा में नारे लगा रहे होंगे_“राहुल गांधी जिंदाबाद”.!
राजनीतिक लड़ाइयाँ राजनीतिक मोर्चे पर लड़ी जानी हैं.
राहुल गांधी के प्रति इस प्रेम में “कांग्रेसी” कहलाने का जोखिम है.
इसके बावजूद कहता हूँ कि तटस्थता एक मिथ है.
इस देश को आज निःसंकोच राहुल गांधी के साथ खड़ा हो जाना चाहिए.
सिविल सोसाइटी होने का दंभ और नॉन पॉलिटिकल होने की भीरुता त्यागनी है.

राहुल गांधी नाम के इस इंसान को फिर सराहने का मन है.
यह इंसान मेरे दिल में गहरा उतर चुका है
क्योंकि यह सत्य का अलम लेकर लड़ाई लड़ने वाला निर्भय मानुष है.
इतनी गालियाँ बर्दाश्त करके प्रेम की अलख जगाने वाले हमने कितने लोग देखे हैं?