जयपुर, (dusrikhabar.com). काशी विश्वविद्यालय से लौटते हुए अकसर सांझ के झीने अंधियारे में ऊंचे खड़े दरख्तों की छाया तले, उस नौबत- खाने की ओर देख कर मन व्यथित होता रहा है। अब वहां कुछ भी नहीं रहा. सिर्फ भूरी-सूखी मिट्टी के ऊंचे-नीचे टीलों और ढूहों सरीखे दीखते कंकालनुमा दीवारों की गिरी-अधगिरी कतारों के सिवाय, जिन पर सूखी घास उग आयी है. सिर्फ टंगा रहा गया है, जबान पर बस एक नाम – गुरुधाम।




